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2024 में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ेगी कांग्रेस, अपनों ने ही दिखाया ‘बाहर’ का रास्ता, वहज-‘पप्पू’?

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Congress will contest elections on least number of seats after independence
बिलासपुर:

लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल शुरू हो गया है. बीजेपी तबड़तोड़ बैठकें करके सत्ता की हैट्रिक लगाने की जुगत में है तो कांग्रेस के सामने अपने सियासी वजूद को बचाए रखने चुनौती है. यही वजह है कि कांग्रेस ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर INDIA का गठन कर रखा है और सीट शेयरिंग को लेकर हर समझौता करने के लिए तैयार है. ऐसे में कांग्रेस को अपने सियासी इतिहास से सबसे कम सीटों पर 2024 के चुनाव में उतरना पड़ सकता है. INDIA गठबंधन में शामिल छत्रप अपने-अपने राज्य में कांग्रेस के लिए बहुत ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं दिख रहे है. यही वजह है कि कांग्रेस को बिहार से लेकर यूपी, दिल्ली और पश्चिम बंगाल तक ‘जहर का घूंट पीकर’ सीटों पर समझौते करने पड़ रहे हैं. देखना है कि कांग्रेस सारे समझौता करने के बाद 2024 में क्या हासिल कर पाती है?

आजादी के बाद पहली बार 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 499 में से 489 सीटों पर चुनाव लड़कर 364 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. साल 1957 में कांग्रेस ने 494 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 371 सीटें जीतीं. 1962 में कांग्रेस 494 और 1967 में 523 सीट पर चुनाव लड़ी. 1971 में कांग्रेस 518 सीटों में से 352 सीटें जीती. आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस सभी 542 सीटें में से 154 सीटें ही जीत सकी. पांच साल के बाद 1980 में कांग्रेस 353 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की थी. साल 1984 में कांग्रेस 542 सीटों में से 404 सीटें जीतकर कांग्रेस को ने इतिहास रच दिया और पंजाब में कांग्रेस की जीत से यह आंकड़ा 413 सीटों पर पहुंच गया, जहां चुनाव कुछ महीने बाद हुए थे.

‘पप्पू’ के बाद गिर रहा ग्राफ

1989 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस का ग्राफ नीचे गिरना शुरू हुआ तो फिर लगातार जारी रहा. 1991 लोकसभा चुनाव के दौरान राजीव गांधी की दुखद हत्या के बाद कांग्रेस ने 244 सीटें जीतीं और छोटी पार्टियों के बाहरी समर्थन से पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनाई. इसके बाद 1996 के चुनाव में कांग्रेस 140 सीटों पर सिमट गई. 1998 में कांग्रेस का सियासी ग्राफ और भी कम हो गया, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने एनडीए की सरकार बनाई. 1998 में कांग्रेस 141 सीटें और बीजेपी को 182 सीटें मिली थीं.

साल 1999 चुनाव में कांग्रेस 114 सीट पर रुक गई. कांग्रेस 1999 के लोकसभा चुनाव में 453 सीटों पर अपने कैंडिडेट्स उतारे थे, जिनमें से 114 सीटें ही जीत सकी. इसके बाद 2004 चुनाव में कांग्रेस 417 सीटों पर लड़ी थी जिसमें से 145 जीतने में कामयाह रही थी. उसी तरह 2009 में कांग्रेस ने 440 सीटों पर चुनाव लड़ा और 206 सीटों पर जीत. 2014 से लेकर 2014 तक कांग्रेस सत्ता में रही. 2014 में कांग्रेस 464 सीटों पर लड़ी और सिर्फ 44 ही जीत पाई थी. 2019 के चुनाव में कांग्रेस 421 सीटों पर लड़ी और 52 पर जीती. इसके विपरीत बीजेपी पिछले पांच चुनाव में क्रमश: 339, 364, 433, 428 और 436 सीटों पर चुनाव लड़ी है.

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2004 में 417 सीटों पर लड़ी थी

कांग्रेस अपने सियासी इतिहास में अभी तक सबसे कम सीटों पर 2004 के लोकसभा चुनाव में लड़ी है. 2004 में कांग्रेस ने 417 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, क्योंकि बाकी सीटें गठबंधन के सहयोगियों के लिए छोड़ी थी. कांग्रेस ने महाराष्ट्र में एनसीपी, बिहार में आरजेडी, झारखंड में जेएमएम, तमिलनाडु में डीएमके जैसे दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी थी. कांग्रेस देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में से 417 पर खुद लड़ी थी और बाकी 126 सीटें पर उसके सहयोगी दल लड़े थे. 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के लिए 2024 का चुनाव कोर या मरो वाली स्थिति का है. इसीलिए कांग्रेस हर समझौता करने के लिए तैयार है. यही वजह है कि आजादी के बाद कांग्रेस को अपने सियासी इतिहास में सबसे कम सीटों पर इस बारह चुनाव लड़ने की संभावना दिख रही है.

दरअसल, नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीति में दस्तक देने के साथ ही कांग्रेस पूरी तरफ से कमजोर हो गई है. कांग्रेस के हाथों से देश की ही सत्ता नहीं बल्कि राज्यों से भी बाहर होती जा रही है. ऐसे में कांग्रेस देश के तीन राज्यों में अपने दम पर सरकार में है और तीन राज्यों में सहयोगी दल के साथ सत्ता में भागेदारी बनी हुई है. कांग्रेस पार्टी की कमान गांधी परिवार से बाहर मल्लिकार्जुन खरगे को सौंपी गई और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए 27 विपक्षी दलों के साथ मिलकर गठबंधन किया ताकि बीजेपी को मात दी सके. इसके लिए कांग्रेस ने ममता बनर्जी से लेकर अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, उद्धव ठाकरे, एमके स्टालिन, जयंत चौधरी, शरद पवार की पार्टियों के साथ-साथ लेफ्ट पार्टी के साथ हाथ मिलाया है.

कांग्रेस ने INDIA गठबंधन के छत्रपों के साथ सीट शेयरिंग के लिए कांग्रेस ने मुकुल वासनिक के अगुवाई में अपने नेताओं पांच सदस्यीय कमेटी गठित की है. मुकुल वासनिक के आवास पर बैठक कर समिति के सदस्यों ने 543 लोकसभा सीटों में से कम से कम साढ़े तीन सौ सीटों पर चुनाव लड़ने की रूप रेखा बनाई है, जिसे गठबंधन के सहयोगी दलों के सामने रखेगी. सूत्रों की माने तो इस पैनल ने 292 लोकसभा सीटों को शॉर्टलिस्ट किया है, जहां पर खुद चुनाव लड़ना चाहती है. इसके अलावा सहयोगी दलों के प्रभाव वाले राज्यों में 80 से 85 सीटें चाहती है. हालांकि, कांग्रेस जिस तरह से सीटों का चयन किया है, उस लिहाज से 370 से ज्यादा सीटें उसके रॉडार पर है, लेकिन सहयोगी दल उसे इतनी सीटें देने के मूड में नहीं है. ऐसे में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा 270 सीटों पर ही चुनाव लड़ने आजादी मिल सकती है. ऐसे होता है कि कांग्रेस बहुमत से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ सकता है?

कांग्रेस के रणनीतिकारों के अनुसार गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे नौ बड़े राज्य, जिनमें 152 लोकसभा सीटें हैं, उन पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर है. इन प्रदेशों की सीटों पर कोई दूसरी पार्टी कांग्रेस को मदद नहीं कर सकती है. वहीं, विपक्षी पार्टियों के साथ आने के कारण जिन राज्यों में बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है, वे राज्य हैं- असम, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड और पश्चिम बंगाल हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में यहां भाजपा विरोधी मतों का विभाजन नहीं होगा.

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दिल्ली में जहां भाजपा का सातों सीटों पर कब्जा है, इस बात पर सहमति बन सकती है कि आम आदमी पार्टी पांच सीटों पर लड़े और बाकी दो सीटें कांग्रेस मिल सकती है. इसी तरह पंजाब में कांग्रेस कुल 13 सीटों में से 6 सीटों पर ही अपने कैंडिडेट्स उतार सकती है और बाकी सात सीटें आम आदमी पार्टी को मिल सकती है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 21 सीटों की मांग सपा के सामने रख सकती है, लेकिन अखिलेश यादव सिर्फ 10 से 12 सीटें ही देने के मूड में है. इसी तरह से बिहार में कांग्रेस 9 से 10 सीटें मांग रही है, लेकिन उसे ज्यादा से ज्यादा पांच सीटें ही मिल सकती हैं. झारखंड में कांग्रेस को 3 सीटें ही जेएमम देने के मूड में है जबकि उसकी डिमांड पांच सीटों की है. महाराष्ट्र में कांग्रेस 22 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है, लेकिन उसे 12 से 15 सीटें ही मिल सकती है. बंगाल में ममता बनर्जी बहुत ज्यादा कांग्रेस को सियासी स्पेश नहीं देना चाहती है, जिसके चलते उसे चार से पांच सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है.

क्या 272 से कम सीटों पर लड़ेगी कांग्रेस?

इस तरह कांग्रेस 272 से कम लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ सकता है. ऐसे में 2024 में कांग्रेस जिन लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है, उन सभी पर अगर उसे जीत हासिल हो, तब भी वह अपने दम पर केंद्र में सरकार नहीं बना सकती, क्योंकि बहुमत से कम सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है. राहुल गांधी 14 जनवरी को जिस भारत न्याय यात्रा पर निकल रहे हैं, उन राज्यों की 355 संसदीय सीटें ही आती है और कांग्रेस के सिर्फ 14 सीटें है. ये ऐसे राज्य हैं, जहां पर छत्रपों का ही पूरी तरह दबदबा है. ऐसे में कांग्रेस को जहर का घूंट पीकर ही सीटों के लिए समझौता करना पड़ेगा और उसे अपने इतिहास में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ना होगा?

मैं आपको इस ताज़ा जानकारी के बारे में बताना चाहता हूँ कि लोकसभा चुनावों के संदर्भ में कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के बीच जो माहौल बन रहा है, वह काफी रोमांचक है। बीजेपी सत्ता में एक बार फिर से हावी होने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस अपने स्थान को बचाने की चुनौती में है। इसी कारण, कांग्रेस ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर ‘INDIA’ नामक गठबंधन का गठन किया है और सीटों का बंटवारा करने के लिए तैयारी की है। इस दौरान, कांग्रेस को 2024 के चुनाव में अपने राजनीतिक इतिहास में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ सकता है। ‘INDIA’ गठबंधन में शामिल दलों के सामर्थ्य के कारण, कांग्रेस को बिहार से लेकर यूपी, दिल्ली और पश्चिम बंगाल तक समझौते करने पड़ सकते हैं। क्या कांग्रेस को इस समय अपने रूट्स से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ेगा? इसका अंत देखने के लिए हम सब को धीरज रखना होगा।
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सीहोर में ब्रिज निर्माण के लिए खुदाई करते समय धंसी मिट्टी, 3 मजदूरों की दबने से मौत

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मध्य प्रदेश के सीहोर में सोमवार (23 दिसंबर) को बड़ी घटना हो गई। ब्रिज निर्माण के लिए खुदाई करते समय अचानक मिट्टी धंस गई। दबने से तीन मजदूरों की मौत हो गई। एक को सुरक्षित निकाल लिया।

मध्य प्रदेश के सीहोर में सोमवार (23 दिसंबर) को बड़ी घटना हो गई। बुधनी में ब्रिज का निर्माण कार्य चल रहा है। पुलिया के पास खुदाई करते समय अचानक मिट्टी धंस गई। मिट्‌टी में दबने से 3 मजदूरों की मौत हो गई। एक को रेस्क्यू टीम ने सुरक्षित निकालकर अस्पताल पहुंचाया है। घटना शाहगंज थाना क्षेत्र के सियागहन गांव की है। पुलिस मामले की जांच में जुट गई है।

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रेस्क्यू कर एक को सुरक्षित बाहर निकाला
शाहगंज थाना क्षेत्र के सियागहन गांव में ब्रिज का निर्माण कार्य चल रहा है। सोमवार को चार मजदूर निर्माण के लिए दूसरी पुलिया के पास से मिट्टी खोद रहे थे। खुदाई के समय अचानक मिट्टी धंस गई। सूचना मिलने पर पुलिस और प्रशासन की टीम पहुंची। रेस्क्यू टीम ने एक मजदूर को सुरक्षित बाहर निकाल लिया। तीन की मौत हो गई।

हादसे में इनकी हुई मौत
पुलिस के मुताबिक, लटेरी (विदिशा) निवासी करण (18) पिता घनश्याम, रामकृष्ण उर्फ रामू (32) पिता मांगीलाल गौड और गुना के रहने वाले भगवान लाल पिता बरसादी गौड़ की मौत हो गई। लटेरी निवासी वीरेंद्र पिता सुखराम गौड (25) को सुरक्षित बाहर निकाला गया। वीरेंद्र को नर्मदापुरम रेफर किया है।

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राजलक्ष्मी कंस्ट्रक्शन करवा रहा निर्माण
प्रशासनिक अधिकारियों के मुताबिक, राजलक्ष्मी कंस्ट्रक्शन पुलिया का निर्माण कार्य करा रहा है। पुलिया सियागहन और मंगरोल गांव को जोड़ती है। पुलिया की रिटेनिंग वॉल बनाते समय पहले से बनी रोड की रिटेनिंग वॉल का स्लैब धंस गया। पोकलेन मशीन से मिट्टी हटाकर चारों मजदूरों को बाहर निकाला गया, लेकिन तीन की मौत हो गई। वीरेंद्र का इलाज चल रहा है।

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इंजीनियर अतुल के बेटे की कस्टडी को लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला, 4 साल के बच्चे की तलाश जारी

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Atul Subhash Suicide: एआई इंजीनियर का परिवार बिहार के समस्तीपुर में रहता है। निकिता और अतुल का 4 साल का एक बेटा है। अतुल के पिता पीएम मोदी से पोते की कस्टडी दिलाने की गुहार लगा चुके हैं।

Atul Subhash Suicide: बेंगलुरु के इंजीनियर अतुल सुभाष की मां अंजू मोदी ने अपने 4 साल के पोते की कस्टडी के लिए शुक्रवार (20 दिसंबर) को सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की। सुभाष ने अपने सुसाइड नोट और वीडियो में पत्नी निकिता सिंघानिया और ससुराल पक्ष पर उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए थे। जिसके बाद बेंगलुरु पुलिस ने निकिता समेत तीन लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। बता दें कि एआई इंजीनियर अतुल ने पिछले 9 दिसंबर को बेंगलुरु स्थित अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

पोते के ठिकाने को लेकर गहरी चिंता
अंजू मोदी ने पोते के ठिकाने का पता लगाने और उसकी कस्टडी सुनिश्चित करने के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका दाखिल की है। इसमें दावा है कि न तो सुभाष की अलग रह रही पत्नी निकिता सिंघानिया और न ही उनके परिवार के किसी सदस्य, जो फिलहाल हिरासत में हैं, ने बच्चे के ठिकाने की जानकारी दी है। दूसरी ओर, निकिता ने पुलिस से कहा था कि उसका बेटा फरीदाबाद के एक बोर्डिंग स्कूल में पढ़ाई कर रहा है और उसके चाचा सुशील सिंघानिया की देखरेख में है। लेकिन सुशील ने बच्चे की स्थिति की जानकारी होने से इनकार किया है।

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सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों से जवाब मांगा
जस्टिस बीवी नागरथना और जस्टिस एन कोटिस्वर सिंह की बेंच ने उत्तर प्रदेश, हरियाणा और कर्नाटक की सरकारों को नोटिस जारी कर बच्चे की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 7 जनवरी को होगी।

अतुल सुभाष की आत्महत्या से जुड़ी गिरफ्तारी
इंजीनियर सुभाष की आत्महत्या के मामले में कई गिरफ्तारियां हुई हैं। पत्नी निकिता सिंघानिया, सास निशा सिंघानिया और साले अनुराग सिंघानिया को बेंगलुरु पुलिस ने 16 दिसंबर को गिरफ्तार किया था। पुलिस ने सुभाष के छोड़े गए सुसाइड नोट और वीडियो के आधार पर तीनों पर आत्महत्या के लिए उकसाने का मामला दर्ज किया है। अभी वे न्यायिक हिरासत में हैं।

सिंघानिया फैमिली ने जमानत याचिका लगाई
निकिता सिंघानिया के परिजनों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में इस मामले में अग्रिम जमानत के लिए अपील की है। वरिष्ठ वकील मनीष तिवारी ने सुशील सिंघानिया की उम्र (69 वर्ष) और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का हवाला देते हुए आरोपों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करने का दावा किया। जस्टिस आशुतोष श्रीवास्तव ने सुशील को 50 हजार रुपए के निजी मुचलके और सख्त शर्तों के साथ अग्रिम जमानत दी है, जिसमें पुलिस जांच के लिए उपलब्ध रहना और पासपोर्ट सरेंडर करना शामिल है।

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अतुल सुभाष के परिवार की क्या है मांग?

इंजीनियर अतुल सुभाष के परिवार ने आरोप लगाया कि निकिता और उनके परिवार ने झूठे कानूनी मामलों और पैसों की मांग कर अतुल को बुरी तरह प्रताड़ित किया। पिता पवन कुमार और भाई बिकास कुमार ने अतुल की अस्थियों को तब तक न बहाने की कसम खाई है जब तक उन्हें न्याय नहीं मिलता।

भाई बिकास कुमार ने कहा- ‘जो लोग इस घटना के पीछे हैं, उन्हें भी गिरफ्तार किया जाना चाहिए। जब तक हमारे खिलाफ झूठे मामले वापस नहीं लिए जाते, हमें न्याय नहीं मिलेगा। हमारा संघर्ष जारी रहेगा।’

बिकास ने अपने भतीजे की सुरक्षा पर भी चिंता जताई और कहा- ‘मुझे अपने भतीजे (अतुल के बेटे) की सुरक्षा की चिंता है। हमने उसे हाल की तस्वीरों में नहीं देखा है। हम उसके ठिकाने की जानकारी चाहते हैं और उसकी कस्टडी जल्द से जल्द चाहते हैं।’

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10 वंदे भारत स्लीपर ट्रेनें निर्माणाधीन, 200 रेक का निर्माण प्रौद्योगिकी साझेदारों के जिम्मे: अश्विनी वैष्णव

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  • विश्व स्तरीय यात्रा के अनुभव के लिए भारतीय रेल अप्रैल 2018 से केवल एलएचबी कोच बना रहा है; 2004-14 की तुलना में 2014-24 के दौरान निर्मित एलएचबी कोचों की संख्या 16 गुना से अधिक है।
  • “सुगम्य भारत मिशन” के हिस्से के रूप में भारतीय रेल दिव्यांगजनों और कम गतिशीलता वाले यात्रियों को अधिकांश मेल/एक्सप्रेस रेलगाड़ियों और वंदे भारत ट्रेनों में व्यापक सुविधाएं प्रदान करता है।

वर्तमान में देश में लंबी और मध्यम दूरी की यात्रा के लिए 10 वंदे भारत स्लीपर ट्रेनें निर्माणाधीन हैं। पहला प्रोटोटाइप निर्मित हो चुका है और इसका फील्ड ट्रायल किया जाएगा। इसके अलावा, 200 वंदे भारत स्लीपर रेक के निर्माण का काम भी प्रौद्योगिकी भागीदारों को सौंपा गया है। सभी रेलगाड़ियों के उपयोग में आने की समयसीमा उनके सफल परीक्षणों पर निर्भर है। 02 दिसंबर 2024 तक, देश भर में छोटी और मध्यम दूरी की यात्रा के लिए भारतीय रेल के ब्रॉड गेज विद्युतीकृत नेटवर्क पर 136 वंदे भारत रेलगाड़ी सेवाएं जारी हैं।

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रेल, सूचना एवं प्रसारण तथा इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने लोकसभा में एक वक्तव्य में कहा कि विश्व स्तरीय यात्रा का अनुभव प्रदान करने के लिए भारतीय रेल के ब्रॉड गेज विद्युतीकृत नेटवर्क पर वर्तमान में चेयर कार वाली 136 वंदे भारत रेल सेवाएं जारी हैं। अक्टूबर 2024 तक वंदे भारत एक्सप्रेस रेलगाड़ियों की कुल क्षमता 100% से अधिक होगी।

एक अन्य प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि भारतीय रेल की उत्पादन इकाइयां अप्रैल 2018 से केवल एलएचबी कोच बना रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में एलएचबी कोच का उत्पादन लगातार बढ़ा है। 2014-24 के दौरान निर्मित एलएचबी कोच की संख्या 2004-14 के दौरान निर्मित (2,337) संख्या से 16 गुना (36,933) अधिक है। भारतीय रेल (आईआर) ने एलएचबी कोचों की भरमार कर दी है जो तकनीकी रूप से बेहतर हैं और इनमें एंटी क्लाइम्बिंग व्यवस्था, विफलता संकेत प्रणाली के साथ एयर सस्पेंशन और कम संक्षारक शेल जैसी विशेषताएं हैं।

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“सुगम्य भारत मिशन” (सुलभ भारत अभियान) के हिस्से के रूप में, भारतीय रेल दिव्यांगजनों और कम गतिशीलता वाले यात्रियों के लिए सुगमता सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण प्रगति कर रहा है। दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 के दिशा-निर्देशों के अंतर्गत, रैंप, सुलभ पार्किंग, ब्रेल और स्पर्शनीय संकेत, कम ऊंचाई वाले काउंटर और लिफ्ट/एस्कलेटर जैसी व्यापक सुविधाएँ प्रदान की गई हैं।

नवंबर 2024 तक भारतीय रेल ने 399 स्टेशनों पर 1,512 एस्कलेटर और 609 स्टेशनों पर 1,607 लिफ्टें स्थापित की थीं जो पिछले दशक की तुलना में उल्लेखनीय वृद्धि को दर्शाता है – क्रमशः 9 और 14 गुना की वृद्धि। इसके अलावा, अधिकांश मेल और एक्सप्रेस रेलगाड़ियों में चौड़े प्रवेश द्वार, सुलभ शौचालय और व्हीलचेयर पार्किंग वाले कोच उपलब्ध हैं, जबकि वंदे भारत रेलगाड़ियां दिव्यांगजनों के लिए स्वचालित दरवाजे, निर्धारित स्थान और ब्रेल साइनेज जैसी सुविधाओं के साथ बेहतर सुगमता प्रदान करती हैं।

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