देश
2024 में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ेगी कांग्रेस, अपनों ने ही दिखाया ‘बाहर’ का रास्ता, वहज-‘पप्पू’?
लोकसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों के बीच शह-मात का खेल शुरू हो गया है. बीजेपी तबड़तोड़ बैठकें करके सत्ता की हैट्रिक लगाने की जुगत में है तो कांग्रेस के सामने अपने सियासी वजूद को बचाए रखने चुनौती है. यही वजह है कि कांग्रेस ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर INDIA का गठन कर रखा है और सीट शेयरिंग को लेकर हर समझौता करने के लिए तैयार है. ऐसे में कांग्रेस को अपने सियासी इतिहास से सबसे कम सीटों पर 2024 के चुनाव में उतरना पड़ सकता है. INDIA गठबंधन में शामिल छत्रप अपने-अपने राज्य में कांग्रेस के लिए बहुत ज्यादा सीटें देने के मूड में नहीं दिख रहे है. यही वजह है कि कांग्रेस को बिहार से लेकर यूपी, दिल्ली और पश्चिम बंगाल तक ‘जहर का घूंट पीकर’ सीटों पर समझौते करने पड़ रहे हैं. देखना है कि कांग्रेस सारे समझौता करने के बाद 2024 में क्या हासिल कर पाती है?
आजादी के बाद पहली बार 1952 में हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने कुल 499 में से 489 सीटों पर चुनाव लड़कर 364 सीटें जीतने में कामयाब रही थी. साल 1957 में कांग्रेस ने 494 सीटों पर चुनाव लड़ी थी और 371 सीटें जीतीं. 1962 में कांग्रेस 494 और 1967 में 523 सीट पर चुनाव लड़ी. 1971 में कांग्रेस 518 सीटों में से 352 सीटें जीती. आपातकाल के बाद 1977 में कांग्रेस सभी 542 सीटें में से 154 सीटें ही जीत सकी. पांच साल के बाद 1980 में कांग्रेस 353 सीटें जीतकर सत्ता हासिल की थी. साल 1984 में कांग्रेस 542 सीटों में से 404 सीटें जीतकर कांग्रेस को ने इतिहास रच दिया और पंजाब में कांग्रेस की जीत से यह आंकड़ा 413 सीटों पर पहुंच गया, जहां चुनाव कुछ महीने बाद हुए थे.
‘पप्पू’ के बाद गिर रहा ग्राफ
1989 के लोकसभा चुनाव के बाद से कांग्रेस का ग्राफ नीचे गिरना शुरू हुआ तो फिर लगातार जारी रहा. 1991 लोकसभा चुनाव के दौरान राजीव गांधी की दुखद हत्या के बाद कांग्रेस ने 244 सीटें जीतीं और छोटी पार्टियों के बाहरी समर्थन से पीवी नरसिम्हा राव के नेतृत्व में सरकार बनाई. इसके बाद 1996 के चुनाव में कांग्रेस 140 सीटों पर सिमट गई. 1998 में कांग्रेस का सियासी ग्राफ और भी कम हो गया, अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में भाजपा ने एनडीए की सरकार बनाई. 1998 में कांग्रेस 141 सीटें और बीजेपी को 182 सीटें मिली थीं.
साल 1999 चुनाव में कांग्रेस 114 सीट पर रुक गई. कांग्रेस 1999 के लोकसभा चुनाव में 453 सीटों पर अपने कैंडिडेट्स उतारे थे, जिनमें से 114 सीटें ही जीत सकी. इसके बाद 2004 चुनाव में कांग्रेस 417 सीटों पर लड़ी थी जिसमें से 145 जीतने में कामयाह रही थी. उसी तरह 2009 में कांग्रेस ने 440 सीटों पर चुनाव लड़ा और 206 सीटों पर जीत. 2014 से लेकर 2014 तक कांग्रेस सत्ता में रही. 2014 में कांग्रेस 464 सीटों पर लड़ी और सिर्फ 44 ही जीत पाई थी. 2019 के चुनाव में कांग्रेस 421 सीटों पर लड़ी और 52 पर जीती. इसके विपरीत बीजेपी पिछले पांच चुनाव में क्रमश: 339, 364, 433, 428 और 436 सीटों पर चुनाव लड़ी है.
2004 में 417 सीटों पर लड़ी थी
कांग्रेस अपने सियासी इतिहास में अभी तक सबसे कम सीटों पर 2004 के लोकसभा चुनाव में लड़ी है. 2004 में कांग्रेस ने 417 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे, क्योंकि बाकी सीटें गठबंधन के सहयोगियों के लिए छोड़ी थी. कांग्रेस ने महाराष्ट्र में एनसीपी, बिहार में आरजेडी, झारखंड में जेएमएम, तमिलनाडु में डीएमके जैसे दलों के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ी थी. कांग्रेस देश की कुल 543 लोकसभा सीटों में से 417 पर खुद लड़ी थी और बाकी 126 सीटें पर उसके सहयोगी दल लड़े थे. 2014 और 2019 लोकसभा चुनाव हारने के बाद कांग्रेस के लिए 2024 का चुनाव कोर या मरो वाली स्थिति का है. इसीलिए कांग्रेस हर समझौता करने के लिए तैयार है. यही वजह है कि आजादी के बाद कांग्रेस को अपने सियासी इतिहास में सबसे कम सीटों पर इस बारह चुनाव लड़ने की संभावना दिख रही है.
दरअसल, नरेंद्र मोदी के केंद्रीय राजनीति में दस्तक देने के साथ ही कांग्रेस पूरी तरफ से कमजोर हो गई है. कांग्रेस के हाथों से देश की ही सत्ता नहीं बल्कि राज्यों से भी बाहर होती जा रही है. ऐसे में कांग्रेस देश के तीन राज्यों में अपने दम पर सरकार में है और तीन राज्यों में सहयोगी दल के साथ सत्ता में भागेदारी बनी हुई है. कांग्रेस पार्टी की कमान गांधी परिवार से बाहर मल्लिकार्जुन खरगे को सौंपी गई और 2024 के लोकसभा चुनाव के लिए 27 विपक्षी दलों के साथ मिलकर गठबंधन किया ताकि बीजेपी को मात दी सके. इसके लिए कांग्रेस ने ममता बनर्जी से लेकर अखिलेश यादव, नीतीश कुमार, लालू प्रसाद यादव, उद्धव ठाकरे, एमके स्टालिन, जयंत चौधरी, शरद पवार की पार्टियों के साथ-साथ लेफ्ट पार्टी के साथ हाथ मिलाया है.
कांग्रेस ने INDIA गठबंधन के छत्रपों के साथ सीट शेयरिंग के लिए कांग्रेस ने मुकुल वासनिक के अगुवाई में अपने नेताओं पांच सदस्यीय कमेटी गठित की है. मुकुल वासनिक के आवास पर बैठक कर समिति के सदस्यों ने 543 लोकसभा सीटों में से कम से कम साढ़े तीन सौ सीटों पर चुनाव लड़ने की रूप रेखा बनाई है, जिसे गठबंधन के सहयोगी दलों के सामने रखेगी. सूत्रों की माने तो इस पैनल ने 292 लोकसभा सीटों को शॉर्टलिस्ट किया है, जहां पर खुद चुनाव लड़ना चाहती है. इसके अलावा सहयोगी दलों के प्रभाव वाले राज्यों में 80 से 85 सीटें चाहती है. हालांकि, कांग्रेस जिस तरह से सीटों का चयन किया है, उस लिहाज से 370 से ज्यादा सीटें उसके रॉडार पर है, लेकिन सहयोगी दल उसे इतनी सीटें देने के मूड में नहीं है. ऐसे में कांग्रेस को ज्यादा से ज्यादा 270 सीटों पर ही चुनाव लड़ने आजादी मिल सकती है. ऐसे होता है कि कांग्रेस बहुमत से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ सकता है?
कांग्रेस के रणनीतिकारों के अनुसार गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, असम, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, राजस्थान और उत्तराखंड जैसे नौ बड़े राज्य, जिनमें 152 लोकसभा सीटें हैं, उन पर भाजपा और कांग्रेस की सीधी टक्कर है. इन प्रदेशों की सीटों पर कोई दूसरी पार्टी कांग्रेस को मदद नहीं कर सकती है. वहीं, विपक्षी पार्टियों के साथ आने के कारण जिन राज्यों में बीजेपी को सबसे ज्यादा नुकसान हो सकता है, वे राज्य हैं- असम, हरियाणा, कर्नाटक, झारखंड और पश्चिम बंगाल हैं, क्योंकि ऐसी स्थिति में यहां भाजपा विरोधी मतों का विभाजन नहीं होगा.
दिल्ली में जहां भाजपा का सातों सीटों पर कब्जा है, इस बात पर सहमति बन सकती है कि आम आदमी पार्टी पांच सीटों पर लड़े और बाकी दो सीटें कांग्रेस मिल सकती है. इसी तरह पंजाब में कांग्रेस कुल 13 सीटों में से 6 सीटों पर ही अपने कैंडिडेट्स उतार सकती है और बाकी सात सीटें आम आदमी पार्टी को मिल सकती है. उत्तर प्रदेश में कांग्रेस 21 सीटों की मांग सपा के सामने रख सकती है, लेकिन अखिलेश यादव सिर्फ 10 से 12 सीटें ही देने के मूड में है. इसी तरह से बिहार में कांग्रेस 9 से 10 सीटें मांग रही है, लेकिन उसे ज्यादा से ज्यादा पांच सीटें ही मिल सकती हैं. झारखंड में कांग्रेस को 3 सीटें ही जेएमम देने के मूड में है जबकि उसकी डिमांड पांच सीटों की है. महाराष्ट्र में कांग्रेस 22 सीटों पर चुनाव लड़ने की तैयारी में है, लेकिन उसे 12 से 15 सीटें ही मिल सकती है. बंगाल में ममता बनर्जी बहुत ज्यादा कांग्रेस को सियासी स्पेश नहीं देना चाहती है, जिसके चलते उसे चार से पांच सीटों पर संतोष करना पड़ सकता है.
क्या 272 से कम सीटों पर लड़ेगी कांग्रेस?
इस तरह कांग्रेस 272 से कम लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ सकता है. ऐसे में 2024 में कांग्रेस जिन लोकसभा सीटों पर चुनाव लड़ने की योजना बना रही है, उन सभी पर अगर उसे जीत हासिल हो, तब भी वह अपने दम पर केंद्र में सरकार नहीं बना सकती, क्योंकि बहुमत से कम सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है. राहुल गांधी 14 जनवरी को जिस भारत न्याय यात्रा पर निकल रहे हैं, उन राज्यों की 355 संसदीय सीटें ही आती है और कांग्रेस के सिर्फ 14 सीटें है. ये ऐसे राज्य हैं, जहां पर छत्रपों का ही पूरी तरह दबदबा है. ऐसे में कांग्रेस को जहर का घूंट पीकर ही सीटों के लिए समझौता करना पड़ेगा और उसे अपने इतिहास में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ना होगा?
मैं आपको इस ताज़ा जानकारी के बारे में बताना चाहता हूँ कि लोकसभा चुनावों के संदर्भ में कांग्रेस और अन्य राजनीतिक दलों के बीच जो माहौल बन रहा है, वह काफी रोमांचक है। बीजेपी सत्ता में एक बार फिर से हावी होने की कोशिश कर रही है, जबकि कांग्रेस अपने स्थान को बचाने की चुनौती में है। इसी कारण, कांग्रेस ने विपक्षी दलों के साथ मिलकर ‘INDIA’ नामक गठबंधन का गठन किया है और सीटों का बंटवारा करने के लिए तैयारी की है। इस दौरान, कांग्रेस को 2024 के चुनाव में अपने राजनीतिक इतिहास में सबसे कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ सकता है। ‘INDIA’ गठबंधन में शामिल दलों के सामर्थ्य के कारण, कांग्रेस को बिहार से लेकर यूपी, दिल्ली और पश्चिम बंगाल तक समझौते करने पड़ सकते हैं। क्या कांग्रेस को इस समय अपने रूट्स से भी कम सीटों पर चुनाव लड़ना पड़ेगा? इसका अंत देखने के लिए हम सब को धीरज रखना होगा।देश
‘मोदी नाम की बीमारी…’ PCC चीफ दीपक बैज का भड़काउ बयान
रायपुर: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल के 12 वर्ष पूरे होने पर भारतीय जनता पार्टी (BJP) देशव्यापी जनसंपर्क अभियान चला रही है। इसी कड़ी में केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह दो दिवसीय दौरे पर छत्तीसगढ़ पहुंचे हैं। रायपुर पहुंचते ही उन्होंने कांग्रेस पर तीखा हमला बोला, जिस पर अब छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस कमेटी (PCC) के अध्यक्ष दीपक बैज ने कड़ा पलटवार किया है। दीपक बैज ने तंज कसते हुए कहा कि भाजपा के नेता ‘मोदी नाम की बीमारी’ से बाहर नहीं आ पा रहे हैं।
गिरिराज सिंह ने कांग्रेस पर साधा था निशाना
छत्तीसगढ़ दौरे के दौरान केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने केंद्र सरकार की उपलब्धियां गिनाते हुए कहा कि पीएम मोदी के कार्यकाल में देश ने तकनीकी, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में ऐतिहासिक प्रगति की है। उन्होंने विपक्ष पर हमला बोलते हुए कहा कि कांग्रेस को देश में हुआ यह विकास दिखाई नहीं देता।
सत्ता के नशे में आंखें चौंधिया गई हैं: दीपक बैज
केंद्रीय मंत्री के इस बयान पर पलटवार करने में कांग्रेस ने भी देरी नहीं की। पीसीसी चीफ दीपक बैज ने मीडिया से बातचीत में कहा:
“भाजपा के लोग मोदी नामक बीमारी से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। एक तरफ देश में महंगाई आसमान छू रही है, पेट्रोल-डीजल और गैस सिलेंडर के दाम
आम जनता की पहुंच से बाहर हो रहे हैं, और दूसरी तरफ भाजपा के नेता कह रहे हैं कि विकास हो रहा है।”
‘पेट्रोल पंप जाकर जनता से पूछें विकास की हकीकत’
दीपक बैज ने केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह को नसीहत देते हुए कहा कि अगर उन्हें असल विकास देखना है, तो सिक्योरिटी छोड़कर किसी भी आम पेट्रोल पंप पर जाएं और वहां खड़े आम नागरिकों से पूछें कि देश में कितना विकास हुआ है। जनता खुद उन्हें सच्चाई का जवाब दे देगी। बैज ने आगे कहा कि गिरिराज सिंह को सत्ता का नशा हो गया है, जिसके कारण उनकी आंखें चौंधिया गई हैं और उन्हें जनता की तकलीफें दिखाई नहीं दे रही हैं।
छत्तीसगढ़
कम लागत, ज़्यादा मुनाफ़ा: छत्तीसगढ़ में नैनो उर्वरक लिख रहे हैं किसानों की समृद्धि की नई इबारत
रायपुर: छत्तीसगढ़ की सुशासन सरकार किसानों को वैज्ञानिक और आधुनिक खेती से जोड़कर उनकी आय दोगुनी करने की दिशा में निरंतर काम कर रही है। इसी कड़ी में राज्य सरकार द्वारा कृषि क्षेत्र में नैनो उर्वरकों (नैनो यूरिया और नैनो डीएपी) के उपयोग और उपलब्धता को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। आधुनिक तकनीक और किसान-हितैषी नीतियों के माध्यम से खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बनाने का प्रयास किया जा रहा है।
- कम लागत में बेहतर उत्पादन का बेहतरीन विकल्प
पारंपरिक खाद के मुकाबले नैनो यूरिया और नैनो डीएपी किसानों के लिए बेहद किफायती और असरदार साबित हो रहे हैं। मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार, नैनो उर्वरकों के उपयोग से न केवल फसलों का उत्पादन बेहतर होता है, बल्कि किसानों की जेब पर पड़ने वाला बोझ भी कम होता है।
- बचेंगे पैसे, घटेगी मेहनत
नैनो उर्वरकों की सबसे बड़ी खासियत इनकी सुगमता है। जहां पहले भारी-भरकम खाद की बोरियों को लाने-ले जाने और भंडारण (Storage) में काफी दिक्कतें आती थीं, वहीं अब नैनो तकनीक के कारण:
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परिवहन (Transportation) का खर्च बेहद कम हो गया है।
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भंडारण की समस्या से मुक्ति मिली है।
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खेतों में छिड़काव के लिए लगने वाली मजदूरी की लागत में भारी कमी आई है।
“सुशासन सरकार का संकल्प”
सरकार का मुख्य उद्देश्य आधुनिक तकनीक को सीधे किसानों के खेतों तक पहुँचाना है, ताकि लागत कम हो और मुनाफा ज़्यादा। आधुनिक और वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाकर छत्तीसगढ़ के किसान अब समृद्धि और आत्मनिर्भरता की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।
देश
पीएम मोदी के नेतृत्व में राज्यों में बीजेपी का विस्तार, कई प्रदेशों में रचा नया राजनीतिक इतिहास
नई दिल्ली: भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के कई राज्यों में अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत करते हुए लगातार चुनावी सफलताओं का नया इतिहास रचा है। एक समय जिन राज्यों में बीजेपी का प्रभाव सीमित था, वहां आज पार्टी न केवल सत्ता में पहुंची है बल्कि लगातार जीत दर्ज कर अपनी स्थिति को और मजबूत किया है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पिछले एक दशक में बीजेपी ने संगठन विस्तार, मजबूत नेतृत्व और प्रभावी चुनावी रणनीति के दम पर देश के विभिन्न हिस्सों में अपना जनाधार बढ़ाया है। महाराष्ट्र, हरियाणा, असम, त्रिपुरा और ओडिशा जैसे राज्यों में पार्टी ने उल्लेखनीय प्रदर्शन करते हुए नई राजनीतिक इबारत लिखी है।
- महाराष्ट्र और हरियाणा से मिली नई दिशा
साल 2014 बीजेपी के लिए कई मायनों में ऐतिहासिक साबित हुआ। महाराष्ट्र में पार्टी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी और देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में पहली बार पूर्ण रूप से बीजेपी सरकार का गठन हुआ। इसी वर्ष हरियाणा में भी पार्टी ने नया इतिहास रचते हुए मनोहर लाल खट्टर को मुख्यमंत्री बनाया। इसके बाद दोनों राज्यों में बीजेपी ने लगातार चुनावी सफलता हासिल कर अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए रखी।
- पूर्वोत्तर में मजबूत हुआ कमल
पूर्वोत्तर भारत में बीजेपी का विस्तार वर्ष 2016 से तेज़ी से शुरू हुआ। असम में पहली बार पार्टी की सरकार बनी और सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने। इसके बाद अरुणाचल प्रदेश में पेमा खांडू और मणिपुर में एन. बीरेन सिंह के नेतृत्व में बीजेपी ने अपनी राजनीतिक स्थिति मजबूत की। वर्ष 2018 में त्रिपुरा में वामपंथी दलों के लंबे शासन को समाप्त कर बीजेपी ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की।
- ओडिशा में बदला राजनीतिक समीकरण
वर्ष 2024 में ओडिशा की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला। लंबे समय तक सत्ता में रही क्षेत्रीय राजनीति को चुनौती देते हुए बीजेपी ने पहली बार पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाकर राज्य में नया राजनीतिक अध्याय शुरू किया।
- संगठन और रणनीति का मिला लाभ
बीजेपी की लगातार चुनावी सफलताओं को पार्टी संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं की सक्रियता और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी ने विभिन्न राज्यों में स्थानीय मुद्दों को राष्ट्रीय दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हुए मतदाताओं तक अपनी पहुंच बढ़ाई है।
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