राजनीति
Haryana Chunav Result 2024: लाडवा से नायब सिंह सैनी की जीत, दोबारा बनेंगे हरियाणा के CM!

Haryana Chunav Result 2024: हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने एक बार फिर से सत्ता में वापसी की है। लाडवा विधानसभा सीट से नायब सिंह सैनी ने बड़ी जीत हासिल की है और सियासी गलियारों में खबर है कि राज्य के अगले मुख्यमंत्री बनने जा रहे हैं।
भाजपा ने चुनाव से कुछ महीने पहले एक अहम कदम उठाते हुए मनोहर लाल खट्टर की जगह नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री पद की जिम्मेदारी सौंपी थी, और अब इस दांव ने पार्टी को शानदार जीत दिलाई है।
मार्च 2024 में, मनोहर लाल खट्टर के साढ़े नौ साल के कार्यकाल के बाद, पार्टी ने सत्ता विरोधी लहर का सामना करते हुए नायब सिंह सैनी को मुख्यमंत्री बनाया। यह कदम पार्टी की ओबीसी और गैर-जाट समुदाय पर अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा था। सैनी को मुख्यमंत्री बनाए जाने के बाद पार्टी ने लगातार विपक्षी हमलों का सामना किया, जिनमें बेरोजगारी, महंगाई, अग्निपथ योजना और किसानों के मुद्दे प्रमुख थे।
हालांकि, सैनी के नेतृत्व में पार्टी ने तुरंत काम करना शुरू किया। उन्होंने हरियाणा ‘अग्निवीर नीति 2024’ को मंजूरी दी, जिससे राज्य के युवाओं को सशस्त्र बलों में सेवा के बाद रोजगार और उद्यमिता के अवसर मिल सकें। इसके साथ ही, न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर 10 और फसलों को खरीदने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई, जिससे हरियाणा अब 24 फसलों को MSP पर खरीदने वाला एकमात्र राज्य बन गया।
भाजपा के चुनावी वादे
भाजपा ने अपने चुनाव घोषणापत्र में कई लोकलुभावन वादे किए, जिनमें ‘हर घर ग्रहणी योजना’ के तहत 500 रुपये में रसोई गैस सिलेंडर उपलब्ध कराना, महिलाओं को 2,100 रुपये मासिक वित्तीय सहायता और युवाओं के लिए दो लाख सरकारी नौकरियां देने का वादा शामिल था। इसके अलावा, हरियाणा के अग्निवीरों को सरकारी नौकरियों में प्राथमिकता दी जाएगी।
सैनी की जीत और भविष्य की रणनीति
चुनाव आयोग के अनुसार, नायब सिंह सैनी ने लाडवा विधानसभा सीट से अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी, कांग्रेस के मेवा सिंह, को 16,054 मतों के अंतर से हराया। यह अंतर काफी बड़ा रहा। भाजपा ने चुनाव से पहले स्पष्ट कर दिया था कि अगर पार्टी सत्ता में वापसी करती है, तो नायब सिंह सैनी ही मुख्यमंत्री बनेंगे। हालांकि, वरिष्ठ नेता अनिल विज ने भी अपनी दावेदारी पेश की थी, लेकिन सैनी की नेतृत्व क्षमता और ओबीसी समुदाय के समर्थन ने उन्हें पार्टी का प्रमुख चेहरा बना दिया।
सैनी के सीएम बनने से ओबीसी समुदाय और गैर-जाट वोटर्स में भाजपा की पकड़ और मजबूत हुई। इस कदम ने राज्य में जातिगत समीकरणों को भाजपा के पक्ष में झुका दिया, जिससे पार्टी को निर्णायक बढ़त मिली।
कैसा है सैनी का सियासी सफर?
25 जनवरी 1970 को अंबाला के मिर्जापुर माजरा गांव में जन्मे सैनी 2014 से 2019 के बीच खट्टर कैबिनेट में मंत्री रहे। पिछले तीन दशकों में सैनी ने राज्य भाजपा में कई पद हासिल किए। वे हरियाणा भाजपा किसान मोर्चा के जिला अध्यक्ष और महासचिव के पद पर रहे। वे 2002 में राज्य भाजपा युवा विंग के अंबाला जिला महासचिव थे और तीन साल बाद जिला अध्यक्ष बने। वे 2014 में नारायणगढ़ निर्वाचन क्षेत्र से हरियाणा विधानसभा और 2019 में कुरुक्षेत्र सीट से लोकसभा के लिए चुने गए।
पार्टी द्वारा ओबीसी समुदाय और गैर-जाटों पर अपनी पकड़ मजबूत करने के प्रयास में सैनी को अक्टूबर 2023 में हरियाणा भाजपा प्रमुख के रूप में नियुक्त किया गया था। मुख्यमंत्री पद पर उनका उत्थान खट्टर के समान ही था। 2014 में जब भाजपा अपने दम पर सत्ता में आई, तो उसने रामबिलास शर्मा, अनिल विज, कैप्टन अभिमन्यु और ओपी धनखड़ जैसे कई वरिष्ठ पार्टी नेताओं को दरकिनार करते हुए करनाल से पहली बार विधायक बने खट्टर को मुख्यमंत्री पद के लिए चुना। खट्टर अब केंद्रीय मंत्री हैं।
हरियाणा में भाजपा की जीत के 7 प्रमुख फैक्टर
कमियों को समझना और उन्हें दूर करना: पार्टी ने पिछले चुनावों में हुई गलतियों को समझा और उन्हें समय रहते सुधारा।
जातिगत और बिरादरी समीकरणों का ध्यान रखना: ओबीसी और गैर-जाट समुदायों के वोट को सैनी के नेतृत्व में भाजपा ने मजबूती से साधा।
सही खर्च और प्रचार रणनीति: भाजपा ने अपने चुनाव प्रचार में सुनियोजित तरीके से खर्च किया, जिससे कांग्रेस की आंतरिक लड़ाई का फायदा उठाया।
कांग्रेस की 7 गारंटी रहीं असफल: कांग्रेस के वादे मतदाताओं को लुभाने में असफल रहे, और जनता ने भाजपा की योजनाओं पर भरोसा किया।
ओबीसी वोट बैंक का झुकाव: सैनी के सीएम बनने से ओबीसी वोट भाजपा के पक्ष में गया।
नए उम्मीदवारों को मौका: पार्टी ने नए चेहरों को टिकट देकर युवाओं और नए मतदाताओं का भरोसा जीता।
दलित वोट पर ध्यान: भाजपा ने दलित समुदाय के मतदाताओं को आकर्षित करने के लिए विशेष रणनीति अपनाई, जिससे पार्टी की जीत में बड़ा योगदान मिला।
हरियाणा विधानसभा चुनाव 2024 में नायब सिंह सैनी की जीत ने यह साबित कर दिया कि भाजपा की रणनीति सही दिशा में काम कर रही है। ओबीसी और गैर-जाट समुदायों पर ध्यान केंद्रित करते हुए भाजपा ने सत्ता विरोधी लहर को भी सफलतापूर्वक मात दी। अब सैनी दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की कमान संभालने जा रहे हैं, और यह देखना दिलचस्प होगा कि उनकी अगुवाई में हरियाणा में क्या बदलाव आते हैं।
छत्तीसगढ़
छत्तीसगढ़: भाजपा का संगठन चुनाव,मंडल अध्यक्ष 45 और जिलाध्यक्ष 60 साल से ज्यादा का नहीं चलेगा

भाजपा का संगठन चुनाव प्रारंभ हो गया है। 1 दिसंबर से मंडल अध्यक्ष और फिर 15 दिसंबर से जिलाध्यक्षों का चुनाव होगा।
रायपुर: भाजपा का संगठन चुनाव प्रारंभ हो गया है। पहले चरण में बूथ कमेटियों का चुनाव हो जा रहा है। इसके बाद 1 दिसंबर से मंडल अध्यक्ष और फिर 15 दिसंबर से जिलाध्यक्षों का चुनाव होगा। भाजपा के राष्ट्रीय संगठन ने फैसला किया है, मंडल अध्यक्ष 45 साल से ज्यादा का नहीं होना चाहिए। इसी तरह से जिलाध्यक्ष के लिए 60 साल की आयु सीमा तय की गई है। मंडल और जिलों की कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के लिए कोई आयु सीमा नहीं है।
भाजपा का अब भी सदस्यता अभियान चल रहा है। वैसे सदस्यता अभियान का समापन 15 नवंबर को हो जाना था, लेकिन अभी राष्ट्रीय संगठन ने इसको 30 नवंबर तक चलाने का फैसला किया है। प्रदेश भाजपा संगठन को 60 लाख प्राथमिक सदस्य बनाने का लक्ष्य मिला है। यह लक्ष्य अभी पूरा नहीं हो सका है। सदस्यता अभियान के साथ ही बूथ कमेटियों का चुनाव प्रारंभ हो गया है। 30 नवंबर तक सभी बूथों में कमेटियां बनाने का लक्ष्य है।
हर वर्ग को दिया जाएगा मौका
प्रदेश में भाजपा के 405 मंडल हैं। इनमें 1 से 15 दिसंबर तक चुनाव होगा। मंडल अध्यक्ष बनने के लिए यह जरूरी होगा कि अध्यक्ष पद का दावेदार कार्यकर्ता सक्रिय सदस्य हो। पहले संगठन में मोर्चा, प्रकोष्ठ या मंडल में ही किसी पद पर रहा हो। इसी के साथ सबसे बड़ी बात मंडल अध्यक्ष का दावेदार किसी भी हाल में 45 साल से ज्यादा का नहीं होना चाहिए। 45 साल से ज्यादा के दावेदारों में से किसी को भी मंडल अध्यक्ष नहीं बनाया जाएगा।
मंडल अध्यक्ष के साथ ही एक मंडल प्रतिनिधि का भी चुनाव किया जाएगा। ये दोनों मिलकर जहां अपनी कार्यकारिणी बनाएंगे, वहीं जब जिलाध्यक्षों का चुनाव होगा तो इन दोनों को ही मतदान करने का अधिकार रहेगा। मंडलों के बाद जिलाध्यक्षों का चुनाव होगा। जिलाध्यक्षों के लिए आयु सीमा 60 साल तय की गई है।
तीन-तीन जिलों को मिलाकर पर्यवेक्षक और ऑब्जर्वर भी बनाएं जाएंगे। कुल मिलाकर एक दर्जन पर्यवेक्षक बनाएं जाएंगे। ये दावेदारों से बात करके सहमति से किसी एक दावेदार को अध्यक्ष तय करेंगे। इसके लिए जिलों के सांसद, विधायक और वरिष्ठ नेताओं के साथ रायशुमारी भी की जाएगी। हर जिले की स्थिति के हिसाब से हर जाति वर्ग को प्रतिनिधित्व मिल सके, इसका विशेष ध्यान रखा जाएगा।
आयु सीमा तय
संगठन चुनाव के प्रदेश प्रभारी खूबचंद पारख ने बताया कि, मंडल और जिलाध्यक्षों के लिए राष्ट्रीय संगठन ने आयु सीमा तय की है। कार्यकारिणी के पदाधिकारियों के लिए आयु का बंधन नहीं है।
राजनीति
झारखंड चुनाव 2024 परिणाम: हेमंत सोरेन की जीत, लोकनीति-सीएसडीएस ने जमीनी हकीकत पर किया विश्लेषण

Jharkhand Election Result 2024: हेमंत ने ऐसे जीता झारखंड का रण, लोकनीति-सीएसडीएस ने करीब से जानी जमीनी हकीकत
प्रभात खबर के अनुरोध पर भारत की मशहूर शोध संस्था सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज, दिल्ली) ने झारखंड विधानसभा चुनाव के परिणाम के विभिन्न पहलुओं का गहन विश्लेषण किया है कि विपक्ष के जोरदार प्रचार अभियान के बावजूद चुनाव में हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन की प्रचंड जीत कैसे हुई. इस गठबंधन के दोबारा सत्ता में आने की क्या वजह रही. आज पढ़िए ऐसे ही अन्य मुद्दों पर आधारित विश्लेषण शृंखला की पहली कड़ी.
Jharkhand Election Result 2024 : लोकनीति-सीएसडीएस के फाउंडर संजय कुमार, एनआइटीटीइ एजुकेशन ट्रस्ट के निदेशक-अकादमिक संदीप शास्त्री और स्टडीज इन इंडियन पॉलिटिक्स के चीफ एडिटर सुहास पलसीकर ने झारखंड में इंडिया गठबंधन की जीत के कारणों को जानने का प्रयास किया है.
क्षेत्रीय दल रहे बीजेपी को रोकने में कामयाब, ये दो रहे मुख्य कारण
फिर एक बार एक क्षेत्रीय पार्टी भाजपा के रास्ते की बाधा बनी. हालांकि चुनावी नतीजा तो विजयी और पराजित प्रत्याशियों के ब्योरे में मिलेगा, लेकिन झारखंड ने जो व्यापक तस्वीर पेश की, उसके दो प्रधान तत्व हैं. एक है राज्य स्तरीय शक्तियों का पूरी क्षमता और दृढ़ता से अखिल भारतीय अतिक्रमण का मुकाबला करना और उसे रोकना. और दूसरा है आदिवासी अस्मिता पर केंद्रित क्षेत्रीय पहचान और सांस्कृतिक पहचान पर आधारित अखिल भारतीय आक्रामक अभियान के, जिसका लक्ष्य आदिवासियों को अपनी ओर आकर्षित करना था, बीच कड़ा मुकाबला. झारखंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाले गठबंधन की प्रभावी जीत रणनीतिक स्तर पर प्रभावी गठबंधन प्रबंधन और अभियान की जीत है, झामुमो नीत सरकार अपने प्रशासनिक ट्रैक रिकॉर्ड और आदिवासी हितों को सुरक्षित रखने की अपनी छवि की रक्षा कर रही थी. दूसरी ओर, भाजपा नीत गठबंधन ने एक व्यापक विमर्श पेश करने की कोशिश की, जो समाज के सभी वर्गों का प्रतिनिधित्व करती थी. इसके अलावा उसने सत्तारूढ़ सरकार की काहिली और भारी भ्रष्टाचार पर तीखा हमला बोला. भाजपा के विमर्श में हिंदूत्व को जगाने की आक्रामक रणनीति भी थी.
झामुमो ने आदिवासी इलाकों में किया स्वीप तो गैर आदिवासी इलाकों में बीजेपी रही मजबूत
झामुमो गठबंधन न सिर्फ अपना आदिवासी वोट बैंक बचाने में सफल रहा, बल्कि कांग्रेस के साथ मिलकर उसने गैर आदिवासी इलाकों में भी पैठ बढ़ायी. भाजपा ने गैर-आदिवासी इलाकों में तो अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन आदिवासी इलाकों में उसकी मजबूत पकड़ नहीं बन पायी. विजयी गठबंधन में झामुमो निश्चित तौर पर नेतृत्वकारी भूमिका में रहा और उसकी जीत का आंकड़ा 80 फीसदी रहा. गठबंधन में कांग्रेस की भूमिका जूनियर पार्टनर की रही और उसकी जीत का आंकड़ा 50 फीसदी से थोड़ा ही अधिक रहा.
सभी समाजों ने किया इंडिया गठबंधन का समर्थन, एनडीए बीजेपी पर रहा निर्भर
लोकनीति-सीएसडीएस का सर्वे उन तत्वों को चिह्नित करता है, जिसने इंडिया गठबंधन की जीत में भूमिका निभायी है. इंडिया गठबंधन में जहां तमाम पार्टियों के बीच बेहतर तालमेल था और जिसे राज्य के सभी क्षेत्रों से समर्थन मिला, वहीं एनडीए गठबंधन ज्यादातर भाजपा पर निर्भर था. इंडिया गठबंधन के साथियों के बीच सीटों का बेहतर वितरण हुआ, जबकि एनडीए में हर 10 सीटों में से सात पर भाजपा लड़ रही थी. इंडिया गठबंधन में सभी साथियों के साझा संदेश का उनको लाभ मिला. वोटरों के सभी आयु वर्गों के बीच इसे समर्थन मिला. ग्रामीण इलाकों में इंडिया गठबंधन ने अच्छा प्रदर्शन किया. गरीब, मध्य वर्ग और कम पढ़े-लिखे वोटरों का समर्थन इसके साथ था. अनुसूचित जातियों-जनजातियों, मुस्लिमों तथा यादवों का इसे समर्थन मिला. इसके सामाजिक गठजोड़ का पता इसमें शामिल झामुमो, कांग्रेस, राजद तथा कम्युनिस्ट पार्टियों को देखकर चलता है.
मतदाताओं ने पहले से मन बना लिया था किसे करना है वोट
लोकनीति-सीएसडीएस का सर्वे राज्य के वोटरों के बीच के तीव्र ध्रुवीकरण का पता देता है. हेमंत सोरेन सरकार के कामकाज से पूरी तरह संतुष्ट दो तिहाई मतदाताओं ने सत्तारूढ़ गठबंधन के पक्ष में वोट दिया. दूसरी तरफ सत्तारूढ़ गठबंधन के कामकाज से असंतुष्ट दो तिहाई लोगों ने एनडीए गठबंधन के पक्ष में वोट दिया. इससे साफ है कि संतुष्टि से ज्यादा मतदाताओं द्वारा पहले से एक गठबंधन के पक्ष में वोट देने के फैसले से यह परिणाम आया. हालांकि सोरेन सरकार की तुलना में मोदी सरकार के प्रति कुल संतुष्टि ज्यादा थी, लेकिन झामुमो के प्रति मतदाताओं के समर्थन ने वोटिंग पैटर्न को प्रभावित किया.
जमीनी स्तर पर मतदाता सरकार के विकास कार्य से नहीं थे संतुष्ट
आंकड़े बताते हैं कि राज्य के मतदाता जमीनी स्तर पर सरकार के विकास कार्यक्रमों से बहुत संतुष्ट नहीं थे. वे यह मान रहे थे कि पिछले पांच वर्षों में उद्योगों के स्तर पर स्थिति खराब हुई है और भ्रष्टाचार बढ़ा है. जबकि सांप्रदायिक हिंसा और नक्सलवाद के मोर्चे पर हालत में सुधार आया है. पर जिन लोगों ने बेरोजगारी, गरीबी, महंगाई और विकास के अभाव की चर्चा की, उन्होंने इंडिया गठबंधन के उम्मीदवारों को वोट दिया.
महिलाओं ने बड़ी संख्या में किया इंडिया गठबंधन को वोट
दूसरी बात यह कि महिला मतदाताओं ने इंडिया गठबंधन को तरजीह दी. जिस एक और तत्व ने इंडिया गठबंधन के पक्ष में भूमिका निभायी, वह दरअसल मतदाताओं की यह सोच थी कि इस चुनाव में झारखंड राज्य का मुद्दा सबसे बड़ा है. एनडीए गठबंधन के समर्थन में आये राष्ट्रीय नेताओं का भी चुनावी नतीजे पर असर पड़ा.
एनडीए गठबंधन पूरी तरह पीएम मोदी पर निर्भर, लेकिन जनता को सीएम के तौर पर हेमंत पसंद
एनडीए गठबंधन को वोट देने वालों में से ज्यादातर ने नरेंद्र मोदी की भूमिका को रेखांकित किया. ऐसे ही, इंडिया गठबंधन को वोट देने वालों ने राहुल गांधी के असर को स्वीकारा. सर्वे में शामिल लोगों में से एक तिहाई हेमंत सोरेन को फिर से मुख्यमंत्री देखना चाहते थे. इस तरह भाजपा जहां नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर पूरी तरह निर्भर था, वहीं इंडिया गठबंधन में प्रांतीय और राष्ट्रीय स्तर के कई नेताओं ने अपने प्रत्याशियों के पक्ष में वोट मांगे. इस तरह इंडिया गठबंधन की जीत आदिवासी इलाकों में झामुमो के और गैर आदिवासी इलाकों में उसकी सहयोगी पार्टियों के असर के कारण संभव हुई. जनसांख्यिकी के विभिन्न पैमाने पर इंडिया गठबंधन का समर्थन एनडीए से अधिक दिखा.
नहीं चला बंग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा, मतदाताओं ने स्थानीय मुद्दों को दी तरजीह
बेशक सत्तारूढ़ गठबंधन के दौर में भ्रष्टाचार की बात उभर कर सामने आयी, लेकिन दूसरे वोटिंग पैटर्न के हावी होने के कारण इंडिया गठबंधन सत्ता में दोबारा वापस आया. भाजपा ने समान नागरिक संहिता और बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दों पर मतदाताओं को ध्रुवीकृत करने की कोशिश की, लेकिन राज्य के मतदाताओं पर स्थानीय मुद्दों का असर ज्यादा था, जो कि सरना पहचान पर मतदाताओं की प्रतिक्रियाओं से पता चलता है. संताल समुदाय को छोड़कर भाजपा राज्य के और किसी आदिवासी समुदाय को अपनी ओर आकर्षित नहीं कर पायी. दीर्घावधि में भाजपा के सामने इस राज्य के आदिवासियों को अपने पक्ष में एकजुट करने की चुनौती रहेगी. इसे साधने के अलावा राज्य में हिंदुत्व के मुद्दे को धार दे पाने में उसकी सफलता से ही झारखंड में भविष्य का राजनीतिक मुकाबला तय होगा.
देश
राष्ट्रपति इरफान अली, उप-राष्ट्रपति भारत जगदेव, भारतीयों की धरती कैसे बन चुका है गुयाना, जा रहे हैं PM मोदी

Modi Guyana visit: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मंगलवार को कैरेबियाई देश गुयाना की ऐतिहासिक राजकीय यात्रा पर जाएंगे। मोदी की तीन दिवसीय गुयाना यात्रा में ऊर्जा सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण होगी, जो कैरेबियाई क्षेत्र में भारत का प्रमुख साझेदार बनकर उभरा है।
तेल और गैस संसाधनों की खोज के बाद गुयाना एक तेजी से बढ़ता हुआ देश है। देश के साथ जुड़ाव में, भारत न सिर्फ ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा देने की उम्मीद कर रहा है, बल्कि ग्लोबल साउथ देशों और कैरेबियाई क्षेत्र के बीच अपनी स्थिति को मजबूत करने की भी कोशिश कर रहा है।
प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा के दौरान भारत और गुयाना के बीच कई ऊर्जा और रक्षा समझौतों पर हस्ताक्षर होने की उम्मीद है।
भारत और गुयाना में हैं ऐतिहासिक संबंध
भारत, गुयाना के अनूठे इतिहास का भी लाभ उठा रहा है। देश की लगभग 40 प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की है, जिसमें राष्ट्रपति मोहम्मद इरफान अली भी शामिल हैं, जिनके पूर्वजों को 19वीं सदी में ब्रिटिश सरकार ने गिरमिटिया मजदूरों के रूप में कैरिबियन क्षेत्र में भेजा था।
भारत और गुयाना के बीच शीर्ष स्तरीय संपर्क
प्रधानमंत्री मोदी की गुयाना यात्रा, दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय संपर्कों का लेटेस्ट उदाहरण है। पिछले साल, राष्ट्रपति इरफान अली, प्रवासी भारतीय दिवस में मुख्य अतिथि थे और उन्हें प्रवासी भारतीय सम्मान से सम्मानित किया गया था, जो भारतीय मूल के व्यक्तियों के लिए सर्वोच्च सम्मान है।
मोदी की गुयाना यात्रा 1968 में पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की यात्रा के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली गुयाना यात्रा है। मोदी, राष्ट्रपति अली के साथ बातचीत करेंगे और गुयाना की संसद के विशेष सत्र को संबोधित करेंगे। जनवरी 2023 में इरफान अली की भारत यात्रा के बाद, गुयाना के उपराष्ट्रपति भारत जगदेव अगले महीने भारत आए थे।
वहीं, फरवरी में, गुयाना के प्रधान मंत्री मार्क फिलिप्स भी भारत आए थे, जिसके बाद मंत्री-स्तरीय और सैन्य-स्तरीय यात्रा हुई थी।
भारत की एनर्जी सिक्योरिटी
तेल और गैस की खोज के बाद, तेल की तेजी के कारण गुयाना में सालाना 40 प्रतिशत से ज्यादा की वार्षिक वृद्धि हो रही है। चूंकि गुयाना व्यापारियों और निवेशकों के लिए आकर्षण का केंद्र बन गया है, इसलिए भारत ने भी इस देश के साथ अपने संबंधों को बढ़ाया है।
द गार्जियन के अनुसार, दोनों देशों के बीच मजबूत ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंधों के कारण भारत और गुयाना ने कहा है, कि वे पारस्परिक रूप से लाभकारी समझौतों की उम्मीद कर रहे हैं। गुयाना के विदेश सचिव रॉबर्ट पर्साड ने अखबार को बताया, कि मोदी की यात्रा द्विपक्षीय संबंधों में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर साबित होगी।
पर्साड ने आगे कहा, “दोनों देश अपने सहयोग के माध्यम से ऊर्जा, कृषि, प्रौद्योगिकी और सुरक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में अधिक तालमेल विकसित कर सकते हैं। हमारे बीच पहले से ही मजबूत द्विपक्षीय संबंध हैं, लेकिन पीएम मोदी की यात्रा के साथ, यह उम्मीद की जाती है कि गुयाना और भारत के बीच संबंध उस स्तर तक पहुंच जाएंगे, जिससे दोनों देशों को अधिक लाभ होगा।”
अर्थशास्त्री और कैरेबियन पॉलिसी कंसोर्टियम के फेलो स्कॉट मैकडोनाल्ड ने अखबार को बताया, कि मोदी की यात्रा का मकसद भारत की वैश्विक विदेश नीति प्रोफाइल को बढ़ावा देना और कैरेबियन क्षेत्र के बढ़ते ऊर्जा परिसर का दोहन करना है।
मैकडोनाल्ड ने कहा, “गुयाना एक तेल प्रांत के रूप में अपनी स्थिति में ऊपर बढ़ रहा है। यह तेल और प्राकृतिक गैस दोनों के लिए आगे बढ़ता रहेगा और, सच तो यह है कि भारत को बिजली उत्पादन की अपनी क्षमता के मामले में कमी का सामना करना पड़ रहा है। इसे आयातित ऊर्जा की आवश्यकता है। गुयाना के बगल में स्थित सूरीनाम प्राकृतिक तेल और गैस में अपनी क्रांति लाने की कगार पर है… इसलिए, भारत के लिए, दक्षिणी ऊर्जा परिसर जो गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद और टोबैगो और संभवतः ग्रेनेडा है, को देखना भू-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है।”
मोदी की यात्रा से पहले एक ब्रीफिंग में विदेश मंत्रालय के सचिव (पूर्व) जयदीप मजूमदार ने कहा, कि भारत ऊर्जा से जुड़े मुद्दों पर गुयाना के साथ साझेदारी करना चाहता है, लेकिन सहयोग का दायरा बहुत व्यापक है।
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